कुछ दिल ने कहा…


sharmila

कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नहीं…
ऐसी भी बातें होती हैं,
कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नहीं…

लेता है दिल अंगड़ाइयां, इस दिल को समझाये कोई
अरमान ना आँखें खोल दें, रुसवा ना हो जाये कोई
पलकों की ठंडी सेज पर, सपनों की परियां सोती हैं
ऐसी भी बातें होती हैं,
कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नहीं…

दिल की तस्सली के लिये, झूठी चमक झूठा निखार
जीवन तो सूना ही रहा, सब समझे आयी हैं बहार
कलियों से कोई पूछता, हंसती हैं वो या रोती हैं
ऐसी भी बातें होती हैं,
कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नहीं…

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मीठे बोल बोले …


Yaminifinal

मीठे बोल बोले, बोले पायलिया
छूम-छनन बोले, झनक-झन बोले
मीठे बोल बोले …

पग पग नाचे रे, घुंघरु की दासी
इक पग राधा जैसी, इक पग मीरा जैसी
सांवरे की बोली बोले
पायलिया बोले
मीठे बोल बोले …

नैनों की बाँसुरी, कोई सुनाए
अँखियों की ज्योती से, ज्योत जलाए
बावरे से ढोली ढोले
पायलिया बोले
मीठे बोल बोले …

रिम-झिम गिरे सावन. . . . . .


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लत्ता मंगेशकर :

रिम-झिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन
भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन
रिम-झिम गिरे सावन …

पहले भी यूँ तो बरसे थे बादल,
पहले भी यूँ तो भीगा था आंचल
अब के बरस क्यूँ सजन, सुलग सुलग जाए मन
भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन
रिम-झिम गिरे सावन …

इस बार सावन दहका हुआ है,
इस बार मौसम बहका हुआ है
जाने पीके चली क्या पवन, सुलग सुलग जाए मन
भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन
रिम-झिम गिरे सावन …

किशोरकुमार :

रिम-झिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन
भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन
रिम-झिम गिरे सावन …

जब घुंघरुओं सी बजती हैं बूंदे,
अरमाँ हमारे पलके न मूंदे
कैसे देखे सपने नयन, सुलग सुलग जाए मन
भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन
रिम-झिम गिरे सावन …

महफ़िल में कैसे कह दें किसी से,
दिल बंध रहा है किस अजनबी से
हाय करे अब क्या जतन, सुलग सुलग जाए मन
भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन
रिम-झिम गिरे सावन …

ठुमक चलत रामचंद्र…


baalram

 

 

ठुमक चलत रामचंद्र
ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां…

ठुमक चलत रामचंद्र

किलकि किलकि उठत धाय गिरत भूमि लटपटाय .
धाय मात गोद लेत दशरथ की रनियां ..

अंचल रज अंग झारि विविध भांति सो दुलारि .
तन मन धन वारि वारि कहत मृदु बचनियां ..

विद्रुम से अरुण अधर बोलत मुख मधुर मधुर .
सुभग नासिका में चारु लटकत लटकनियां ..

तुलसीदास अति आनंद देख के मुखारविंद .
रघुवर छबि के समान रघुवर छबि बनियां ..

दिल ढूँढता है फिर वही…….


bbbbba

दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन,
बैठे रहे तसव्वुर-ए-जानाँ किये हुए
दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन…

जाड़ों की नर्म धूप और आँगन में लेट कर,
आँखों पे खींचकर तेरे आँचल के साए को
औंधे पड़े रहे कभी करवट लिये हुए
दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन…

या गरमियों की रात जो पुरवाईयाँ चलें,
ठंडी सफ़ेद चादरों पे जागें देर तक
तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुए
दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन…

बर्फ़ीली सर्दियों में किसी भी पहाड़ पर,
वादी में गूँजती हुई खामोशियाँ सुनें
आँखों में भीगे भीगे से लम्हे लिये हुए
दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन…